vishal panwar August 15, 2020


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देश को आजाद कराने में वीरांगनाओं की भी अहम भूमिका रही। वीरांगनाओं ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने के लिए आजादी की लड़ाई का मोर्चा संभाल रखा था। फिरंगियों के खिलाफ फिरोजाबाद में मोर्चाबंदी की गई थी। देशभक्तों में सिर्फ आजादी का जुनून सवार था। आंदोलन की चिंगारी ऐसी भड़की थी कि मंदिरों पर राष्ट्रध्वज फहराया गया। देव प्रतिमाओं को खादी के वस्त्र पहनाए गए।

फिरोजाबाद में सुखदेवी पालीवाल के नेतृत्व में महिलाओं के जत्थे प्रमुख मंदिरों के प्रबंधक से मिलकर देव प्रतिमाओं को खादी वस्त्र पहनाने का आग्रह करते थे। दर्शनार्थियों से भी खादी कपड़े पहनकर मंदिर में आने का विरोध करते थे। मकसद था कि विदेशी वस्तुओं को पूरी तरह से ध्वस्त किया जाए। अंग्रेजों ने इस सत्याग्रह को रोकने के लिए पूरा जोर लगा दिया था। 

तभी महिलाओं की टोली अंग्रेजों के खिलाफ धरने पर बैठ गई थी। विरोध के कारण महिलाओं को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया था। प्रेमवती देवी ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन में सक्रियता से हिस्सा लिया। इस आंदोलन में प्रेमवती को छह माह की जेल हुई। आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन प्रेमवती को दी जाती थी। उस पैसे को वो दान करती थीं। 

स्वतंत्रता संग्राम में ग्राम बरतरा निवासी ठाकुर मोहन सिंह भी सेनानी रहे। बाल्यावस्था में ही मोहन सिंह के सिर से माता-पिता का साया उठ गया तो वे भारत मां की सेवा में जुट गए। अंग्रेजों के जुल्म सहे, मगर संघर्ष से कभी भी न डगे।

ठाकुर मोहन सिंह वर्ष 1929 में कलकत्ता गए। वहां आकर 26 जनवरी 1930 को देश के आंदोलन में भाग लिया। जिसमें जब धर्म तल्ला किले के मैदान में जुलूस पहुंचा तो पुलिस कमिश्नर मिस्टर टेगर ने सुभाषचंद्र बोस को तो गिरफ्तार कर लिया। हजारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घायल हुए। 

जिसमें ठाकुर मोहन सिंह भी शामिल हुए। इसके बाद नमक सत्याग्रह में गांधीजी के आदेश पर शामिल हुए। कलकत्ता से 14 किलोमीटर दूर महेश बघान नाम के स्थान पर तीन कैंप चल रहे थे। स्वामी परमोनंद ब्रह्मचारी के संचालन वाले कैंप में रहते थे। ब्रिटिश सेना ने उस कैंप पर हमला कर दिया था। मगर ठाकुर मनमोहन सिंह ने मोर्चा संभाला। 
आजादी की जंग में जगन्नाथ लहरी का योगदान भी अहम रहा। उन्होंने भी ब्रिटिश सरकार का जमकर विरोध किया। सन 1940 में इंटर की पढ़ाई के दौरान पहली बार सत्याग्रह आंदोलन में जेल गए।  उनके भतीजे केशव लहरी ने बताया कि एक बार जेल जाने के बाद उनमें देश आजाद कराने का जुनून सवार था। 1942 में भारत छोड़ों आंदोलन में फिर पकड़े गए। 

महात्मा गांधी के पत्र भी जगन्नाथ लहरी के पास आते रहते थे। सन 1957 के विधानसभ चुनाव में वो निर्दलीय चुनाव जीते थे। कांग्रेस सत्ता में आई तो उन्हें डिप्टी लेबर मिनस्टिर का प्रसताव भेजा, लेकिन जिद्दी स्वभाव के लहरी यही कहकर मना कर देते थे कि जब कांग्रेस छोड़ दी है तो सरकार में क्यों शामिल होऊं।

देश को आजाद कराने में वीरांगनाओं की भी अहम भूमिका रही। वीरांगनाओं ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने के लिए आजादी की लड़ाई का मोर्चा संभाल रखा था। फिरंगियों के खिलाफ फिरोजाबाद में मोर्चाबंदी की गई थी। देशभक्तों में सिर्फ आजादी का जुनून सवार था। आंदोलन की चिंगारी ऐसी भड़की थी कि मंदिरों पर राष्ट्रध्वज फहराया गया। देव प्रतिमाओं को खादी के वस्त्र पहनाए गए।

फिरोजाबाद में सुखदेवी पालीवाल के नेतृत्व में महिलाओं के जत्थे प्रमुख मंदिरों के प्रबंधक से मिलकर देव प्रतिमाओं को खादी वस्त्र पहनाने का आग्रह करते थे। दर्शनार्थियों से भी खादी कपड़े पहनकर मंदिर में आने का विरोध करते थे। मकसद था कि विदेशी वस्तुओं को पूरी तरह से ध्वस्त किया जाए। अंग्रेजों ने इस सत्याग्रह को रोकने के लिए पूरा जोर लगा दिया था। 

तभी महिलाओं की टोली अंग्रेजों के खिलाफ धरने पर बैठ गई थी। विरोध के कारण महिलाओं को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया था। प्रेमवती देवी ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन में सक्रियता से हिस्सा लिया। इस आंदोलन में प्रेमवती को छह माह की जेल हुई। आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन प्रेमवती को दी जाती थी। उस पैसे को वो दान करती थीं। 


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