vishal panwar August 22, 2020


नई दिल्ली: चीन (China) को आर्थिक मोर्चे पर घायल करने के बाद अब नई दिल्ली (New Delhi) की नजरें ऐसे संगठनों-समूहों पर हैं, जो भारत में रहकर चीन के एजेंडे को आगे बढ़ाने के मंसूबे रखते हैं. पिछले कुछ वर्षों में चीन-आधारित थिंक टैंकों की भारत में बाढ़ आ गई है. ऐसा माना जाता है कि ये थिंक टैंक भारत में चीनी दूतावासों के इशारों पर काम करते हैं.

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की आकलन रिपोर्ट के अनुसार, एक समाजसेवी एवं शिक्षाविद द्वारा ‘भारत चीन संबंधों’ पर थिंक टैंक बनाया गया है, जिसके चीनी दूतावास से करीबी रिश्ते होने का शक है. चीन भारतीय शिक्षण संस्थानों में ‘चाइना स्टडी सेंटर’ स्थापित करने की योजना पर भी काम कर रहा है. जबकि कुछ थिंक-टैंक सामाजिक कार्यों की आड़ में चीनी एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं.

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इस घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रखने वाले एक अधिकारी ने Zee News को बताया कि दिल्ली के बाहर युवाओं के लिए काम करना वाला एक संगठन है. इस संगठन के चीनी दूतावास के साथ रिश्ते कई बार उजागर हुए हैं. संगठन द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में अक्सर दूतावास के मेहमानों को आमंत्रित किया जाता है. इसके अलावा, दूतावास में भी युवाओं पर केंद्रित कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. संगठन चीनी दूतावास के निर्देशों पर भारतीय और चीनी छात्रों के लिए एक ‘एक्सचेंज प्रोग्राम’ भी चलाता है. चीन पर अकादमिक अनुसंधान के लिए समर्पित थिंक टैंकों की संख्या में भी पिछले कुछ वर्षों में इजाफा हुआ है, जिन्हें कम्युनिस्ट झुकाव वालों द्वारा संचालित किया जाता है. 

कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स का मजबूत नेटवर्क

चीन ने विदेशी नागरिकों का ब्रेनवॉश करने के लिए ‘स्टडी द पावरफुल कंट्री’ नामक एक ऐप भी विकसित किया है. बीजिंग भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर दुनिया भर में कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स का व्यापक नेटवर्क स्थापित कर रहा है. हालांकि, अब ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों को उसकी यह साजिश समझ आने लगी है. हाल ही में, भारत और अमेरिकी सरकारों ने इन संस्थानों के कामकाज की जांच के आदेश दिए थे. कुछ दिन पहले ट्रंप प्रशासन ने कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स को विदेशी मिशन करार दिया था और राजनयिक मिशनों पर लगाए गए प्रतिबंधों के समान प्रतिबंध लगाये थे.

पिछले साल सीनेट कमेटी ऑन इंवेस्टिगेशंस ने यह खुलासा किया था कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स और CCP प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए अमेरिकी  विश्वविद्यालयों में 158 मिलियन अमेरिकी डॉलर आवंटित किए. भारत ने भी इस चीनी साजिश को उजागर करने के लिए कदम उठाया है.  सरकार भारत में संचालित कन्फ्यूशियस संस्थानों के साथ-साथ चीनी और भारतीय शिक्षण संस्थानों के बीच हुए समझौतों को जांच के दायरे में लेकर आई है. कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स भारत के कई प्रमुख सार्वजनिक और निजी संस्थानों में स्थापित किए गए हैं. इन संस्थानों पर सीसीपी की इकाइयों के रूप में कार्य करने और चीनी हितों को आगे बढ़ाने का आरोप है. चीनी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने की आड़ में चीन के शिक्षा मंत्रालय द्वारा ऐसे संस्थानों को प्रायोजित किया जाता है.

कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स की स्थापना के अलावा, चीन भारत में पत्रकारों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों का एक मजबूत नेटवर्क स्थापित करने की योजना पर भी काम कर रहा है. कन्फ्यूशियस संस्थानों के कामकाज की समीक्षा के हालिया फैसले के साथ ही मोदी सरकार के रडार पर वह 54 भारतीय संस्थान भी हैं, जिन्होंने चीनी संस्थानों के साथ MOU पर हस्ताक्षर किये थे. इन संस्थानों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NITs), भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (ISER), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) आदि शामिल हैं.

ड्रैगन ने बुना फैलोशिप का जाल
एक दूसरे अधिकारी ने बताया कि ‘चीन लंबे समय से भारतीय शैक्षिक संस्थानों के रास्ते वैचारिक घुसपैठ कर रहा है. प्रमुख भारतीय संस्थानों में उसके अध्ययन केंद्र स्थापित किये जा रहे हैं. दर्जनों ऐसे अध्ययन केंद्र पहले ही प्रौद्योगिकी, प्रबंधन और सामाजिक विज्ञान से संबंधित प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्यरत हैं. भारतीय शैक्षिक क्षेत्रों में चीनी घुसपैठ किस कदर बढ़ गई है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि पूर्वोत्तर का एक प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान चीन में व्यवसायों के प्रबंधन से जुड़ा एक पाठ्यक्रम चला रहा है.’

इसके अलावा, चीन भारतीय छात्रों को फैलोशिप भी प्रदान करने में लगा है, ताकि चीन बुलाकर उनका ब्रेनवॉश किया जा सके. उसकी प्रमुख फैलोशिप में श्वार्ज़मैन फैलोशिप, कन्फ्यूशियस चाइना स्टडीज प्रोग्राम (CCSP), यूनेस्को/पीआरसी सह-प्रायोजित फैलोशिप शामिल हैं.

भारतीय मीडिया में पैठ बनाने की कोशिश
चीन इस बात को अच्छे से जानता है कि मीडिया उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने का सबसे सशक्त माध्यम हो सकता है. इसलिए उसने भारतीय मीडिया में भी अपनी पैठ बनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं. चीन के विदेश मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली चीनी पब्लिक डिप्लोमेसी एसोसिएशन (CPDA) को इस काम की जिम्मेदारी सौंपी गई है. CPDA एक फेलोशिप चलाता है, जिसके तहत भारतीय पत्रकारों को चीन आमंत्रित करके प्रशिक्षित किया जाता है. इन पत्रकारों को वित्तीय लाभ, आवास और अन्य भत्तों की पेशकश की जाती है.  इसके अलावा उनके पास शीर्ष CCP अधिकारियों तक पहुंच भी होती है. भारतीय समाचार एजेंसियों, अंग्रेजी और हिंदी अखबारों और प्रमुख समाचार चैनलों के पत्रकार फेलोशिप पर चीन की यात्रा करते रहे हैं. बदले में पत्रकार, दिलचस्प ढंग से चीन-प्रायोजित कार्यक्रम का उल्लेख किये बिना उसके हित से जुड़ी स्टोरी प्रकाशित करते हैं. हालिया लद्दाख हिंसा के बाद से भारतीय के रूप में ऐसे ‘चीनी सैनिक’ ज्यादा सक्रिय हो गए हैं. ये पत्रकार भारत सरकार के चीन विरोधी फैसलों पर भी सवाल खड़े करते हैं. 

ऑनलाइन मीडिया में भी चीनी घुसपैठ 
ऑनलाइन मीडिया में भी चीन ने जबरदस्त घुसपैठ की हुई है. दर्जनों ऐसे न्यूज पोर्टल हैं, जो भारत में चीन की कम्युनिस्ट सरकार को लेकर समय-समय पर माहौल तैयार करते रहते हैं. बदले में उन्हें चीन से विज्ञापनों के रूप में भारी-भरकम आर्थिक सहायता मिलती है. कुछ वक्त पहले तिब्बती कार्यकर्ताओं ने एक प्रमुख भारतीय अंग्रेजी अखबार की आलोचना की थी. दरअसल, अखबार ने एक विज्ञापन प्रकाशित किया था, जिसमें चीन को एक मसीहा के रूप में दर्शाया गया था. जिसने 1950 के बाद से तिब्बत में आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए बहुत कुछ किया. जानकारों का मानना है कि सरकार को चीन के खिलाफ बड़ा अभियान चलाने की जरूरत है, ताकि शिक्षा संस्थानों और मीडिया के जरिये अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की उसकी कोशिशों को असफल किया जा सके.   

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